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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुःखिता |  २   क
वाष्पेण पिहिता राजन्नोत्तरं किञ्चिदव्रवीत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति