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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान्घोषांस्तथाश्रमान् |  २१   क
अन्वेषन्तो नलं राजन्नाधिजग्मुर्द्विजातय़ः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति