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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
अपकृष्य च लज्जां मां स्वय़मुक्तवती नृप |  ५   क
प्रय़तन्तु तव प्रेष्याः पुण्यश्लोकस्य दर्शने ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति