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विराट पर्व
अध्याय ६७
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विराट उवाच
उपपन्नं कुरुश्रेष्ठे कुन्तीपुत्रे धनञ्जय़े |  १०   क
य एवं धर्मनित्यश्च जातज्ञानश्च पाण्डवः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति