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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो मित्रेषु सर्वेषु वासुदेवे च भारत |  १३   क
प्रेषय़ामास कौन्तेय़ो विराटश्च महीपतिः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति