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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रय़ोदशे वर्षे निवृत्ते पञ्च पाण्डवाः |  १४   क
उपप्लव्ये विराटस्य समपद्यन्त सर्वशः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति