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विराट पर्व
अध्याय ६७
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अर्जुन उवाच
अन्तःपुरेऽहमुषितः सदा पश्यन्सुतां तव |  २   क
रहस्यं च प्रकाशं च विश्वस्ता पितृवन्मय़ि ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति