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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रत्युपय़ातेषु पार्थिवेषु ततस्ततः |  २०   क
तत्रागमद्वासुदेवो वनमाली हलाय़ुधः |  २०   ख
कृतवर्मा च हार्दिक्यो युय़ुधानश्च सात्यकिः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति