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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचान्मृगाञ्जघ्नुर्मेध्यांश्च शतशः पशून् |  २७   क
सुरामैरेय़पानानि प्रभूतान्यभ्यहारय़न् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति