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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्णोपपन्नास्ता नार्यो रूपवत्यः स्वलङ्कृताः |  ३०   क
सर्वाश्चाभ्यभवत्कृष्णा रूपेण यशसा श्रिय़ा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति