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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
तां प्रत्यगृह्णात्कौन्तेय़ः सुतस्यार्थे धनञ्जय़ः |  ३२   क
सौभद्रस्यानवद्याङ्गीं विराटतनय़ां तदा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति