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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रातिष्ठन्महाराजो रूपमिन्द्रस्य धारय़न् |  ३३   क
स्नुषां तां प्रतिजग्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति