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विराट पर्व
अध्याय ६७
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अर्जुन उवाच
वय़ःस्थय़ा तय़ा राजन्सह संवत्सरोषितः |  ४   क
अतिशङ्का भवेत्स्थाने तव लोकस्य चाभिभो ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति