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विराट पर्व
अध्याय ६७
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अर्जुन उवाच
तस्मान्निमन्त्रय़े त्वाहं दुहितुः पृथिवीपते |  ५   क
शुद्धो जितेन्द्रिय़ो दान्तस्तस्याः शुद्धिः कृता मय़ा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति