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विराट पर्व
अध्याय ६७
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अर्जुन उवाच
स्नुषाय़ा दुहितुर्वापि पुत्रे चात्मनि वा पुनः |  ६   क
अत्र शङ्कां न पश्यामि तेन शुद्धिर्भविष्यति ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति