वन पर्व  अध्याय २१

वासुदेव उवाच

अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम् |  २   क
निःस्वाध्याय़वषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रिय़म् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति