विराट पर्व  अध्याय ६७

अर्जुन उवाच

स्वस्रीय़ो वासुदेवस्य साक्षाद्देवशिशुर्यथा |  ८   क
दय़ितश्चक्रहस्तस्य वाल एवास्त्रकोविदः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति