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उद्योग पर्व
अध्याय ६७
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धृतराष्ट्र उवाच
अङ्ग सञ्जय़ मे शंस पन्थानमकुतोभय़म् |  १६   क
येन गत्वा हृषीकेशं प्राप्नुय़ां शान्तिमुत्तमाम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति