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भीष्म पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
प्रमोहः सर्वसत्त्वानामतीव समपद्यत |  २५   क
रजसा चाभिभूतानामस्त्रजालैश्च तुद्यताम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति