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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
क्षरन्निव महामेघो वारिधाराः सहस्रशः |  ११   क
द्रोणमेघः पार्थशैलं ववर्ष शरवृष्टिभिः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति