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विराट पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य विक्षिप्यमाणस्य धनुषोऽभून्महास्वनः |  २५   क
यथा शैलस्य महतः शैलेनैवाभिजघ्नुषः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति