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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
पार्थस्तु प्रहसन्धीमानाचार्यं स शरौघिणम् |  १४   क
विसृजन्तं शितान्वाणानवारय़त तं युधि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति