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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
सारथिं च त्रिभिर्वाणैस्त्रिभिरेव त्रिवेणुकम् |  ४०   क
धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् |  ४०   ख
विरथस्योद्यतं खड्गं शरेणास्य द्विधाच्छिनत् ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति