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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
अमर्षितस्तु हार्दिख्यः प्रविष्टे श्वेतवाहने |  २७   क
विधुन्वन्सशरं चापं पाञ्चाल्याभ्यां समागतः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति