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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
वरुणस्त्वव्रवीत्प्रीतो ददाम्यस्मै वरं हितम् |  ४६   क
दिव्यमस्त्रं सुतस्तेऽय़ं यनावध्यो भविष्यति ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति