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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
नास्ति चाप्यमरत्वं वै मनुष्यस्य कथञ्चन |  ४७   क
सर्वेणावश्यमर्तव्यं जातेन सरितां वरे ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति