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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
तेषामाय़च्छतां सङ्ख्ये परस्परमजिह्मगैः |  ५   क
अर्जुनो ध्वजिनीं राजन्नभीक्ष्णं समकम्पय़त् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति