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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त शौरिं सा विन्ध्यं गिरिमिवानिलः |  ५२   क
प्रत्यभ्ययात्तं विप्रोढा कृत्येव दुरधिष्ठिता ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति