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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
पतमानस्तु स वभौ पर्णाशाय़ाः प्रिय़ः सुतः |  ५७   क
सम्भग्न इव वातेन वहुशाखो वनस्पतिः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति