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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
सोऽतिविद्धः शरैस्तीक्ष्णैर्गाण्डीवप्रेषितैर्मृधे |  ६१   क
अर्जुनं प्रतिविव्याध दशभिः कङ्कपत्रिभिः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति