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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
स भिन्नमर्मा स्रस्ताङ्गः प्रभ्रष्टमुकुटाङ्गदः |  ६८   क
पपाताभिमुखः शूरो यन्त्रमुक्त इव ध्वजः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति