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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
गिरेः शिखरजः श्रीमान्सुशाखः सुप्रतिष्ठितः |  ६९   क
निर्भग्न इव वातेन कर्णिकारो हिमात्यये ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति