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द्रोण पर्व
अध्याय ८९
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धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् |  २७   क
पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति