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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
ऊर्जस्करं तव सैन्यस्य नित्य; ममित्रवित्रासनमीड्यरूपम् |  १३   क
विख्यातमादित्यसमस्य लोके; त्विषा समं पावकभानुचन्द्रैः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति