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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
शक्तिर्वर्म वलं तेजः कान्तत्वं सत्यमक्षतिः |  ३४   क
व्रह्मण्यत्वमसंमोहो भक्तानां परिरक्षणम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति