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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं धर्ममनुक्रान्तं सदा दानपरैर्नरैः |  ३७   क
आनृशंस्यगुणोपेतैः कामक्रोधविवर्जिताः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति