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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
व्रुवन्किरीटी तमतिप्रहृष्टो; अय़ं शरो मे विजय़ावहोऽस्तु |  २२   क
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः; कर्णं समाप्तिं नय़तां यमाय़ ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति