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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
तेनेषुवर्येण किरीटमाली; प्रहृष्टरूपो विजय़ावहेन |  २३   क
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभेण; चक्रे विषक्तं रिपुमातताय़ी ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति