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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
शरैर्विभुग्नं व्यसु तद्विवर्मणः; पपात कर्णस्य शरीरमुच्छ्रितम् |  २६   क
स्रवद्व्रणं गैरिकतोय़विस्रवं; गिरेर्यथा वज्रहतं शिरस्तथा ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति