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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
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वासुदेव उवाच
भगवन्तं प्रपन्नोऽहं निःश्रेय़सपराय़णः |  ४   क
याचे त्वां शिरसा विप्र यद्व्रूय़ां तद्विचक्ष्व मे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति