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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
शरैराचितसर्वाङ्गः शोणितौघपरिप्लुतः |  ३०   क
विभाति देहः कर्णस्य स्वरश्मिभिरिवांशुमान् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति