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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
सहस्रनेत्रप्रतिमानकर्मणः; सहस्रपत्रप्रतिमाननं शुभम् |  ३७   क
सहस्ररश्मिर्दिनसङ्क्षय़े यथा; तथापतत्तस्य शिरो वसुन्धराम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति