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वन पर्व
अध्याय १७७
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सर्प उवाच
यदि ते वृत्ततो राजन्व्राह्मणः प्रसमीक्षितः |  २५   क
व्यर्था जातिस्तदाय़ुष्मन्कृतिर्यावन्न दृश्यते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति