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आदि पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च; द्यौर्भूमिरापो हृदय़ं यमश्च |  २९   क
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये; धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति