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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
रङ्गावतरणं चैव तथा रूपोपजीवनम् |  ४   क
मद्यमांसोपजीव्यं च विक्रय़ो लोहचर्मणोः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति