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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तौ समाजघ्नतुर्वीरावन्योन्यं पुरुषर्षभौ |  १२   क
शरैराशीविषाकारैर्ज्वलद्भिरिव पन्नगैः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति