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आदि पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
परिपत्य यदा सूनुर्धरणीरेणुगुण्ठितः |  ५२   क
पितुराश्लिष्यतेऽङ्गानि किमिवास्त्यधिकं ततः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति