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आदि पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्पृशतु त्वां समाश्लिष्य पुत्रोऽय़ं प्रिय़दर्शनः |  ५७   क
पुत्रस्पर्शात्सुखतरः स्पर्शो लोके न विद्यते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति