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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
जहाति मृत्युं च जरां भय़ं च; न क्षुत्पिपासे मनसश्चाप्रिय़ाणि |  १३   क
न कर्तव्यं विद्यते तत्र किं चि; दन्यत्र वै इन्द्रिय़प्रीणनार्थात् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति