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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
स तं पप्रच्छ कौन्तेय़ः पुनः पुनररिन्दमम् |  ८   क
धर्मराड्भ्रातरं जिष्णुं समाचष्ट जगत्पतिः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति